उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har waqt mubtala hai gham-o-iztirab mein

हर वक़्त मुब्तला है ग़म-ओ-इज़तिराब में

ہر وقت مبتلا ہے غم و اضطراب میں

शायर: Jaleel Qidwai11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर वक़्त मुब्तला है ग़म-ओ-इज़तिराब में
लग जाए आग इस दिल-ए-ख़ाना-ख़राब में

इक 'उम्र तक फिरा हूँ तलाश-ए-जमाल में
आया न कोई हुस्न मिरे इंतिख़ाब में

अल्लाह मेरे जज़्बा-ए-दीवानगी की ख़ैर
फिर कुछ कमी है आज मिरे इज़्तिराब में

क्या देखिए हो हश्र गुनाह-ओ-सवाब का
गुज़री तमाम 'उम्र गुनाह-ओ-सवाब में

उस सौत-ए-जाँ-नवाज़ से मिलती हुई सदा
मैं सुन रहा हूँ नग़्मा-ए-तार-ए-रबाब में

कहने लगे कि आप के ख़त का जवाब क्या
हूँ बे-जवाब आप के ख़त के जवाब में

माना शराब मन' है लेकिन जनाब-ए-शैख़
फ़रमाएँ कुछ तो आप शब-ए-मह के बाब में

साक़ी मुझे तू आज तो मय बे-हिसाब दे
हैं शीशा-ओ-सुबू-ओ-क़दह किस हिसाब में

बे-शक जनाब-ए-'इश्क़ बहुत ख़ूब है ये बात
लेकिन ये बात ख़ूब है 'अहद-ए-शबाब में

मतलब हिजाब-ए-नफ़्स है जब ये नहीं तो फिर
कुछ भी नहीं है पर्दा-ए-शर्म-ओ-हिजाब में

दीवाना इक सदा का हूँ मुझ को नहीं 'जलील'
कुछ इम्तियाज़ नग़्मा-ए-चंग-ओ-रबाब में