उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har samt sukut bolta hai

हर सम्त सुकूत बोलता है

ہر سمت سکوت بولتا ہے

शायर: Parveen Fana Syed5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर सम्त सुकूत बोलता है
ये कौन से जुर्म की सज़ा है

हैं पाँव लहूलुहान लेकिन
मंज़िल का पता तो मिल गया है

अब लाए हो मुज़्दा-ए-बहाराँ
जब फूल का रंग उड़ चुका है

ज़ख़्मों के दिए की लौ मैं रक़्साँ
अर्बाब-ए-जुनूँ का रत-जगा है

अब तेरे सिवा किसे पुकारूँ
तू मेरे वजूद की सदा है