उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har ek din tha usi ka har ek raat uski

हर एक दिन था उसी का हर एक रात उस की

ہر ایک دن تھا اسی کا ہر ایک رات اس کی

शायर: Zafar Zaidi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर एक दिन था उसी का हर एक रात उस की
मिरे बदन में रही मुद्दतों हयात उस की

मिरी किताब में उस का बयान सच ही तो है
कि मेरे ज़ेहन पे छाई हुई है ज़ात उस की

अजीब ख़्वाब दिखाया है रात आँखों ने
कि मेरे नाम से मंसूब है बरात उस की

सिसक सिसक के कोई रो रहा था दिल में मिरे
किसी ने जैसे चुरा ली हो काएनात उस की

मुझे नसीब हुआ ज़ब्त का ख़ुदा होना
कि मेरे हाथों सजाई गई बरात उस की

मिरी सदा का भी कोई न सुनने वाला मिला
वो चुप थी और सभी सुन रहे थे बात उस की