उर्दू शायरी · ग़ज़ल

haqiqaten hon mayassar to KHwab kyun dekhun

हक़ीक़तें हों मयस्सर तो ख़्वाब क्यूँ देखूँ

حقیقتیں ہوں میسر تو خواب کیوں دیکھوں

शायर: Zafar Zaidi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हक़ीक़तें हों मयस्सर तो ख़्वाब क्यूँ देखूँ
मैं तिश्नगी में भी सम्त-ए-सराब क्यूँ देखूँ

तमाम-उम्र गुज़रनी है जब अँधेरों में
तो एक शब के लिए माहताब क्यूँ देखूँ

मिरे मकान के दरवाज़े बंद रहने दो
मैं अपनी आँख से मौसम ख़राब क्यूँ देखूँ

वरक़ वरक़ तिरे दिल की किताब रौशन हो
तो चेहरा चेहरा नया इंतिसाब क्यूँ देखूँ

जो डूबना है तो सैल-ए-अज़ाब में डूबूँ
फुसून-ए-मौज-ओ-तिलिस्म-ए-हबाब क्यूँ देखूँ