उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hamin pe ranj-o-alam go hazar guzre hain

हमीं पे रंज-ओ-अलम गो हज़ार गुज़रे हैं

ہمیں پہ رنج و الم گو ہزار گزرے ہیں

शायर: JaiKrishn Chaudhry Habeeb9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हमीं पे रंज-ओ-अलम गो हज़ार गुज़रे हैं
जहाँ से गुज़रे हैं हम नग़्मा-बार गुज़रे हैं

हरीम-ए-नाज़ से हम होशियार गुज़रे हैं
मगर वो दिल से तो बे-इख़्तियार गुज़रे हैं

ज़बाँ ज़बाँ पे है मेहर-ओ-वफ़ा के अफ़्साने
जहाँ जहाँ से तिरे जाँ-निसार गुज़रे हैं

नज़र नज़र ने है चूमा दिलों ने चाहा है
जो रहगुज़र से तिरी दिल-फ़िगार गुज़रे हैं

ख़याल-ओ-फ़िक्र की वो रिफ़'अतों को छू के गए
तिरी नज़र से जो ये ख़ाकसार गुज़रे हैं

महक महक सी गई बू-ए-पैरहन से फ़ज़ा
कि आज इधर से वो जान-ए-बहार गुज़रे हैं

ये ख़ून-ए-दिल है जो आँखों की राह बह निकला
कहा ये किस ने कि हम अश्क-बार गुज़रे हैं

रुलाए क्यों न हमें अब क़फ़स में याद उन की
वो रात दिन जो सर-ए-शाख़-सार गुज़रे हैं

'हबीब' मेरी निगाहों से हो वो लाख निहाँ
वो मेरे दिल से मगर बार बार गुज़रे हैं