उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hamesha ke liye sine mein so bhi sakti hai

हमेशा के लिए सीने में सो भी सकती है

ہمیشہ کے لئے سینے میں سو بھی سکتی ہے

शायर: Zafar Iqbal8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हमेशा के लिए सीने में सो भी सकती है
ये बे-जवाज़ मोहब्बत कि हो भी सकती है

अगर पसंद करे मौसमों की हैरानी
तो संग-ए-दिल में कोई बीज बो भी सकती है

वो शक्ल जो नज़र आई है इतनी देर के बा'द
इसी हुजूम-ए-तमाशा में खो भी सकती है

बना भी सकती है बारिश 'इबारतें दिल पर
लिखी हुई कोई तहरीर धो भी सकती है

मैं जानता हूँ कि दरवाज़ा हँस भी सकता है
मैं सोचता हूँ ये दीवार रो भी सकती है

ये धुंध प्यास भी मेरी बुझा नहीं सकती
मिरे वुजूद को लेकिन भिगो भी सकती है

जुदा भी करती है चीज़ों को वो हसीना-ए-ख़्वाब
किसी भी शय में कोई शय समो भी सकती है

बिल-आख़िर एक ये तौफ़ीक़-ए-बे-महार 'ज़फ़र'
कली को ख़ार-ए-हवस में पिरो भी सकती है