उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hamesha kaam kisi aur ka sanbhaalta hun

हमेशा काम किसी और का सँभालता हूँ

ہمیشہ کام کسی اور کا سنبھالتا ہوں

शायर: Zafar Iqbal8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हमेशा काम किसी और का सँभालता हूँ
जो आसमाँ की तरफ़ ये ज़मीं उछालता हूँ

तुलू'-ए-सुब्ह पे मुझ को यक़ीन है पूरा
जभी तो रोज़ का हर काम कल पे टालता हूँ

इसी लिए मिरी सेह्हत भी ठीक रहती है
कभी कभी जो मोहब्बत का रोग पालता हूँ

चढ़ा सका हूँ कुछ अपना ही रंग मैं उस पर
न अपने आप को साँचे में उस के ढालता हूँ

कहीं से और कभी पानी भी आ ही निकलेगा
इसी उमीद पे दरिया में नाव डालता हूँ

हुई है 'उम्र कि मिलता नहीं सुराग़ अपना
मैं चारों सम्त बहुत देखता हूँ भालता हूँ

अज़ल से मेरा मुक़द्दर है जब सियाह सफ़र
तो फिर ये किस के लिए रास्ते उजालता हूँ

मैं अपने आप से नाराज़ हूँ कई दिन से
पड़ा हुआ हूँ 'ज़फ़र' बोलता न चालता हूँ