उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hamare ghar ka ajib-o-gharib manzar hai

हमारे घर का अजीब-ओ-ग़रीब मंज़र है

ہمارے گھر کا عجیب و غریب منظر ہے

शायर: Zafar Zaidi4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हमारे घर का अजीब-ओ-ग़रीब मंज़र है
कहीं तो आग लगी है कहीं समुंदर है

वो फ़ासले हैं कि मिटते नहीं किसी सूरत
सफ़र का भूत शब-ओ-रोज़ मेरे सर पर है

वो एक लफ़्ज़ जो उन्वान-ए-गुफ़्तुगू बनता
वो एक लफ़्ज़ मिरी दस्तरस से बाहर है

किसी की आहटें दिल को हिलाए देती हैं
ज़रूर कोई मेरे जिस्म-ओ-जाँ के अंदर है