उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hamare ahd ka manzar ajib manzar hai

हमारे अहद का मंज़र अजीब मंज़र है

ہمارے عہد کا منظر عجیب منظر ہے

शायर: Hafeez Banarasi11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हमारे अहद का मंज़र अजीब मंज़र है
बहार चेहरे पे दिल में ख़िज़ाँ का दफ़्तर है

न हम-सफ़र ना कोई नक़्श-ए-पा ना रहबर है
जुनूँ की राह में कुछ है तो जान का डर है

हर एक लम्हा हमें डर है टूट जाने का
ये ज़िंदगी है कि बोसीदा काँच का घर है

इसी से लड़ते हुए एक उम्र बीत गई
मिरी अना ही मिरे रास्ते का पत्थर है

तमाम जिस्म हैं जिस के ख़याल में लर्ज़ां
वो तीरगी का नहीं रौशनी का ख़ंजर है

मैं एक क़तरा हूँ लेकिन मिरा नसीब तो देख
कि बे-क़रार मिरे ग़म में इक समुंदर है

उसी के पीछे रवाँ हूँ मैं पागलों की तरह
वो एक शय जो मिरी दस्तरस से बाहर है

इसी ख़याल से मिलता है कुछ सकूँ दिल को
कि ना-सुबूरी तो इस दौर का मुक़द्दर है

कभी तो इस से मुलाक़ात की घड़ी आए
जो मेरे दिल में बसा है जो मेरे अंदर है

उक़ाब-ए-ज़ुल्म के पंजे अभी कहाँ टूटे
अभी तो फ़ाख़्ता-ए-अमन ख़ून में तर है

ख़ुदा की मार हो इस जेहल-ए-आगही पे 'हफ़ीज़'
ब-ज़ो'म-ए-ख़ुद यहाँ हर शख़्स इक पयम्बर है