उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum pe lazim tha pahunchna so yahan tak pahunche

हम पे लाज़िम था पहुँचना सो यहाँ तक पहुँचे

ہم پہ لازم تھا پہنچنا سو یہاں تک پہنچے

शायर: Aamir Azher5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम पे लाज़िम था पहुँचना सो यहाँ तक पहुँचे
शौक़ रुकता ही नहीं चाहे जहाँ तक पहुँचे

ला-मकाँ से जो चले कौन-ओ-मकाँ तक पहुँचे
बे-करानी से गए हद्द-ए-गुमाँ तक पहुँचे

कोई सहरा को चला कोई समुंदर को गया
तेरी आँखों के सुख़न अहल-ए-जहाँ तक पहुँचे

कोई अपनी भी तो ले जाए कभी बात वहाँ
कितने पैग़ाम वहाँ से तो यहाँ तक पहुँचे

दिल का उलझाव है दाग़-ए-दिल-ए-आदम 'आमिर'
दिल को मालूम नहीं दाग़ कहाँ तक पहुँचे