उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum bhi raazi nahin the sadma-e-jari ke liye

हम भी राज़ी नहीं थे सदमा-ए-जारी के लिए

ہم بھی راضی نہیں تھے صدمۂ جاری کے لیے

शायर: Zafar Iqbal6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम भी राज़ी नहीं थे सदमा-ए-जारी के लिए
आप का 'इश्क़ भी था वक़्त-गुज़ारी के लिए

बीन ख़ाली ही बजाना तो ग़लत है कि तुम्हें
साँप भी चाहिए है कोई पिटारी के लिए

ख़्वाहिश-ए-वस्ल को शुनवाई ही काफ़ी है बहुत
और क्या चाहिए तक़दीर की मारी के लिए

अपनी औक़ात बहुत जानता पहचानता है
निगह-ए-लुत्फ़ ही काफ़ी है भिकारी के लिए

ये भी क्या कम है कि मजमा' तो लगा रक्खा है
और क्या चीज़ है दरकार मदारी के लिए

ख़ुद क़तार अपनी से बाहर हुए जाते हैं 'ज़फ़र'
जो परेशान बहुत हैं मिरी बारी के लिए