उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum bhi apne shahr mein yaro phirte the farhad bane

हम भी अपने शहर में यारो फिरते थे फ़रहाद बने

ہم بھی اپنے شہر میں یارو پھرتے تھے فرہاد بنے

शायर: Qaisarul Jafri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम भी अपने शहर में यारो फिरते थे फ़रहाद बने
क्या क्या इश्क़ रचाया बरसों लिक्खें तो रूदाद बने

जिन आँखों को पढ़ते पढ़ते ग़ज़लें कहना सीख गए
अब उन आँखों के अफ़्साने भूली-बिसरी याद बने

सारे पंछी पँख समेटे डाली-डाली बैठे हैं
जिस का जी हो जाल बिछाए जो चाहे सय्याद बने

शाह-जहाँ का ताज-महल हो या जोगी की कुटिया हो
सपनों के हर रूप-नगर की मिट्टी ही बुनियाद बने

ग़ज़लें कहना सहल न जानो ये लफ़्ज़ों का खेल नहीं
बरसों हम ने ज़हर पिया है शाइ'र उस के बा'द बने

'क़ैसर' मेरी ग़ज़लें आख़िर किस के ग़म में डूबी हैं
जब काग़ज़ पर लिख कर देखूँ हर नग़्मा फ़रियाद बने