उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hai aur baat bahut meri baat se aage

है और बात बहुत मेरी बात से आगे

ہے اور بات بہت میری بات سے آگے

शायर: Zafar Iqbal9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

है और बात बहुत मेरी बात से आगे
ज़मीन ज़र्रा है इस काएनात से आगे

इक और सिलसिला-ए-हादसात है रौशन
इस एक सिलसिला-ए-हादसात से आगे

हवा-ए-अक्स-ए-बहार-ओ-ख़िज़ाँ नहीं है फ़क़त
अगर निगाह करो फूल पात से आगे

ये हम जो पेट से ही सोचते हैं शाम ओ सहर
कभी तो जाएँगे इस दाल-भात से आगे

कुछ और तरह के अतराफ़ मुंतज़िर हैं कहीं
उठाएँ ज़हमत अगर शश-जहात से आगे

न रोक पाए तग़य्युर की तेज़ तुग़्यानी
जो बंद बाँधने आए सबात से आगे

कुएँ में बैठ के ही टरटरा गए कुछ दिन
नज़र पड़ा नहीं कुछ अपनी ज़ात से आगे

इस आब ओ रंग से बाहर भी इक तमाशा है
चले-चलो जो नज़र की सिफ़ात से आगे

'ज़फ़र' ये दिन तो नतीजा है रात का यकसर
कुछ और ढूँडता रहता हूँ रात से आगे