उर्दू शायरी · ग़ज़ल

haden phailin nazar ki phir bhi kam-bini nahin jati

हदें फैलीं नज़र की फिर भी कम-बीनी नहीं जाती

حدیں پھیلیں نظر کی پھر بھی کم بینی نہیں جاتی

शायर: Ijtiba Rizvi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हदें फैलीं नज़र की फिर भी कम-बीनी नहीं जाती
कि हर सूरत अभी एक आँख से देखी नहीं जाती

ज़मीन-ए-दिल बहुत कुछ नर्म कर दी बे-क़रारी ने
मगर हम हैं इसी एहसास की सख़्ती नहीं जाती

हयात-ए-जामा-ज़ेब और नौ-ब-नौ जामे मगर क्या है
कि इस बर्बाद-सामाँ की तुनुक-रख़ती नहीं जाती

तजल्ली बे-नक़ाब और कोर आँखें क्या क़यामत है
कि सूरज सामने है और सियह-बख़्ती नहीं जाती

मिरा ज़िक्र-ए-वफ़ा लिख कर मोअर्रिख़ ये भी लिखता है
ये इक रस्म-ए-कुहन थी अब कहीं बरती नहीं जाती

मैं क्या मुँह ले के आऊँ आप के आईना-ख़ाने में
ये सूरत ऐसी बिगड़ी है कि पहचानी नहीं जाती

तसव्वुर से भी आगे जुस्तुजू की राह जाती है
वहाँ की बात लेकिन फिर यहाँ लाई नहीं जाती

तकल्लुफ़-बर-तरफ़ रस्म-ए-मुरव्वत तह करो 'रिज़वी'
मोहब्बत आप होती है मोहब्बत की नहीं जाती