उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hathon mein kashkol sawali dhup nagar ke basi

हाथों में कश्कोल सवाली धूप नगर के बासी

ہاتھوں میں کشکول سوالی دھوپ نگر کے باسی

शायर: Tahir Hanfi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हाथों में कश्कोल सवाली धूप नगर के बासी
सह लेते हैं सब की गाली धूप नगर के बासी

गलियों में जो भटक रहे हैं इक रोटी की ख़ातिर
तोड़ेंगे वो भूक की डाली धूप-नगर के बासी

जिन के पास नहीं हैं कपड़े तन को ढाँपने ख़ातिर
रातें ओढ़ते हैं वो काली धूप-नगर के बासी

अपने ख़्वाबों की ताबीरों को वो पा लेते हैं
तेरे दर की चूम के जाली धूप-नगर के बासी

अपनी धुन में मस्त हो रहते अपने गीत हो गाते
इश्क़ में कैसी राह निकाली धूप-नगर के बासी

'ताहिर' वो पोशीदा रक्खें या फिर ज़ाहिर कर दें
हालत है जो देखने वाली धूप-नगर के बासी