उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hath lahraata raha wo baiTh kar khiDki ke sath

हाथ लहराता रहा वो बैठ कर खिड़की के साथ

ہاتھ لہراتا رہا وہ بیٹھ کر کھڑکی کے ساتھ

शायर: Iftikhar Naseem5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हाथ लहराता रहा वो बैठ कर खिड़की के साथ
मैं अकेला दूर तक भागा गया गाड़ी के साथ

हो गया है ये मकाँ ख़ाली सदाओं से मगर
ज़ेहन अब तक गूँजता है रेल की सीटी के साथ

मुद्दतें जिस को लगी थीं मेरे पास आते हुए
हो गया मुझ से जुदा वो किस क़दर तेज़ी के साथ

कोई बादल मेरे तपते जिस्म पर बरसा नहीं
जल रहा हूँ जाने कब से जिस्म की गर्मी के साथ

नींद कतरा के गुज़र जाती है आँखों से 'नसीम'
जागता रहता हूँ अब मैं शब की वीरानी के साथ