उर्दू शायरी · ग़ज़ल

guzre hue waqton ka nishan tha to kahan tha

गुज़रे हुए वक़्तों का निशाँ था तो कहाँ था

گزرے ہوئے وقتوں کا نشاں تھا تو کہاں تھا

शायर: Aamir Azher8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गुज़रे हुए वक़्तों का निशाँ था तो कहाँ था
हम से जो निहाँ है वो अयाँ था तो कहाँ था

इस तरह लिपटती है उदासी कि ये सोचें
दो पल की ख़ुशी का जो गुमाँ था तो कहाँ था

बस्ती का तक़ाज़ा है कहीं हैं तो कहाँ हैं
मजनूँ का बयाबाँ में मकाँ था तो कहाँ था

बैठा है मिरे पास कि चलना नहीं मुमकिन
सोहबत की हदों का जो निशाँ था तो कहाँ था

अब सोचते हैं बैठ के गुलशन की फ़ज़ा में
सहरा में हमारा जो मकाँ था तो कहाँ था

पीरी है बुज़ुर्गी है बुढ़ापा है कि क्या है
इस कर्ब में रहना कि जवाँ था तो कहाँ था

नश्शा ही नहीं सब का भरम टूट रहा था
सुनते थे कोई पीर-ए-मुग़ाँ था तो कहाँ था

'आमिर' को हमीं ढूँड के लाएँ हैं ब-मुश्किल
कहते हैं वो पहले से यहाँ था तो कहाँ था