उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ghurbat ke ranj faqa-kashi ke malal khinch

ग़ुर्बत के रंज फ़ाक़ा-कशी के मलाल खींच

غربت کے رنج فاقہ کشی کے ملال کھینچ

शायर: Dagh Dehlvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ग़ुर्बत के रंज फ़ाक़ा-कशी के मलाल खींच
ऐ 'दाग़' पर ज़माने से दस्त-ए-सवाल खींच

नाज़ुक बहुत है रिश्ता-ए-उल्फ़त न टूट जाए
इतना न अपने आप को ऐ मह-जमाल खींच

हो जाए तू न ताइर-ए-दिल की तरह असीर
सय्याद अपनी सम्त को आहिस्ता जाल खींच

खींची थी जब मुसव्विर-ए-क़ुदरत ने दिल की शक्ल
कहता ये कौन तू न इसे बे-ख़याल खींच

वो ठंडे ठंडे चैन से घर को चले गए
ले और आह-ए-सर्द दिल-ए-पुर-मलाल खींच

नासेह क़िमार-गाह-ए-मोहब्बत में जी न हार
दिल को लगा के नफ़अ' उठा ख़ूब माल खींच

ऐ 'दाग़' जज़्ब-ए-इश्क़ की देखेंगे अब कशिश
की उस कशीदा-रू ने तो हम से कमाल खींच