उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gulshan nahin dekhe ki bayaban nahin dekha

गुलशन नहीं देखे कि बयाबाँ नहीं देखा

گلشن نہیں دیکھے کہ بیاباں نہیں دیکھا

शायर: Jaleel Qidwai7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गुलशन नहीं देखे कि बयाबाँ नहीं देखा
तुझ सा कोई ऐ रश्क-ए-गुलिस्ताँ नहीं देखा

हर हाल में मम्नून है वो तेरे करम का
दीवाने को तेरे कभी गिर्यां नहीं देखा

थी शाक़ दम-ए-क़ैद जो गुलशन से जुदाई
मुँह फेर के भी मैं ने गुलिस्ताँ नहीं देखा

हर-चंद शब-ओ-रोज़ रही मश्क़-ए-तसव्वुर
आँखों ने मगर वो रुख़-ए-ताबाँ नहीं देखा

किस दर्जा वो मजबूर भी है रहम के क़ाबिल
जिस को कि किसी ने कभी गिर्यां नहीं देखा

ऐसा कि जिसे कुफ़्र का 'इरफ़ान हो हासिल
दुनिया में कोई साहब-ए-ईमाँ नहीं देखा

होने को 'जलील' और हैं नाकाम हज़ारों
तुझ सा भी कोई सोख़्ता-सामाँ नहीं देखा