उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gulshan mein tere husn ki jab baat chali hai

गुलशन में तिरे हुस्न की जब बात चली है

گلشن میں ترے حسن کی جب بات چلی ہے

शायर: JaiKrishn Chaudhry Habeeb7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गुलशन में तिरे हुस्न की जब बात चली है
ठहरी है नज़र गुल पे न ग़ुंचे पे रुकी है

रखती है जिगर गरचे वो नाज़ुक सी कली है
तूफ़ानों से खेली है वो काँटों में पली है

जो लब पे न आ पाई वो आँखों ने कही है
आँखें भी न कह पाईं जो वो दिल ने सुनी है

आ कर तिरे दर पर मुझे एहसास हुआ ये
भटकी हुई कश्ती मिरी साहिल से लगी है

कितने ही चमन उजड़े हुए ख़ाक नशेमन
क्या वक़्त की आँखों में कभी आई नमी है

एक बूँद को तरसा कोई है पी के कोई मस्त
मयख़ाने का साक़ी अभी अंदाज़ वही है

देखा है 'हबीब' उस ने जो एक बार करम से
हर शय मुझे अब प्यार से ही देख रही है