उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gul sadaqat se mahakte hue tasir mein rakh

गुल सदाक़त से महकते हुए तासीर में रख

گل صداقت سے مہکتے ہوئے تاثیر میں رکھ

शायर: Aabid Jafri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गुल सदाक़त से महकते हुए तासीर में रख
सानेहा दिल पे जो गुज़रे वही तहरीर में रख

ताक़-ए-ज़िंदाँ में चराग़-ए-ग़म-ए-हस्ती न जला
आतिश-ए-इश्क़-ए-दरूँ हल्क़ा-ए-ज़ंजीर में रख

ख़िश्त-ए-बे-फ़ैज़ जो आरास्ता गुफ़्तार में है
उस को बुनियाद बना कर किसी ता'मीर में रख

ज़ुल्मतों से किसी घर की नहीं होती पहचान
संग-ओ-गुल ही नहीं कुछ नूर भी जागीर में रख

कब तलक दोष पे ख़्वाबों के करेगा परवाज़
हम-नशीं अज़्म-ए-सफ़र वादी-ए-ता'बीर में रख

दीद की ज़ीस्त से ता-मर्ग तलब आ पहुँची
हीला-जू और बहाने तू न ताख़ीर में रख

सरवरी ज़ोर-ए-तकल्लुम से न मिल पाएगी
हम-नशीं इज्ज़-ए-बयाँ ख़ूबी-ए-तक़रीर में रख