उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gul na hon Khaar-e-mughilan hi sahi

गुल न हों ख़ार-ए-मुग़ीलाँ ही सही

گل نہ ہوں خار مغیلاں ہی سہی

शायर: Habeeb Ahmad Siddiqui8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गुल न हों ख़ार-ए-मुग़ीलाँ ही सही
कुछ तो हो चश्मक-ए-पिंहाँ ही सही

उन के दामन की तमन्ना कब तक
आओ अब अपना गरेबाँ ही सही

कुछ तो हो दिल की रफ़ाक़त के लिए
इज़्तिराब-ए-शब-ए-हिज्राँ ही सही

मेरे ईमाँ से किसी को मतलब
ख़ैर वो दुश्मन-ए-ईमाँ ही सही

दिल की फ़ितरत है शरर-अंदोज़ी
ज़िंदगी शो'ला-ब-दामाँ ही सही

फिर भी कुछ सा’य-ए-अमल अच्छी है
आप पर रहमत-ए-यज़्दाँ ही सही

ताब-ए-शिकवा जो नहीं है उन से
शिकवा-ए-गर्दिश-ए-दौराँ ही सही

चाहिए इस के लिए भी तौफ़ीक़
बुत-गरी फ़ितरत-ए-इंसाँ ही सही