उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bahut latif hai ye muKHtasar jahan apna

बहुत लतीफ़ है ये मुख़्तसर जहाँ अपना

بہت لطیف ہے یہ مختصر جہاں اپنا

शायर: Habeeb Ahmad Siddiqui11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बहुत लतीफ़ है ये मुख़्तसर जहाँ अपना
जिगर-नवाज़ भी तू तू ही राज़दाँ अपना

तमाम दौलत-ए-हस्ती लुटा के माँगूँगा
बहार-ए-हुस्न तिरी ज़ौक़-ए-जावेदाँ अपना

बहम हुए हैं शनासा-ए-यक-दिगर दोनों
निगाह-ए-नाज़ तिरी क़ल्ब-ए-ख़ूँ-चकाँ अपना

शफ़क़ में सीना-ए-गुल में जुनूँ की वादी में
बटा है ख़ून-ए-जिगर भी कहाँ कहाँ अपना

ये 'आरज़ी ही सही आब-ओ-रंग-ए-हुस्न मगर
लुटा रही है ख़िरद इन पे कारवाँ अपना

जबीं-नवाज़ है जलवों की ये फ़रावानी
कहाँ है आज सर-ए-नंग-ए-आस्ताँ अपना

नवाज़िशात-ए-गुज़िश्ता कि अब ख़याली हैं
बना रहा हूँ उन्हीं से मैं गुलिस्ताँ अपना

'अजीब ज़ौक़-फ़ज़ा जुस्तुजू की लज़्ज़त है
भटकने दो भी ज़रा देर कारवाँ अपना

हज़ार कुछ न सही मुश्त-ए-ख़ाक-ए-इंसाँ में
'उरूज-ए-'अर्श पे है फिर भी आस्ताँ अपना

न सूद ही न ज़ियाँ ही न रंज-ओ-राहत है
है 'अक़्ल-ओ-होश के पर्दे में इम्तिहाँ अपना

हैं आश्ना-ए-हवादिस तो ख़ौफ़-ए-बर्क़ ही क्या
दिखा दिखा के बनाते हैं आशियाँ अपना