उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ai dil ye sai-e-zabt kahin raegan na ho

ऐ दिल ये स'ई-ए-ज़ब्त कहीं राएगाँ न हो

اے دل یہ سعیٔ ضبط کہیں رائیگاں نہ ہو

शायर: Habeeb Ahmad Siddiqui9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ऐ दिल ये स'ई-ए-ज़ब्त कहीं राएगाँ न हो
डरता हूँ फिर वो दुश्मन-ए-जाँ मेहरबाँ न हो

कोई बताए ऐसी नज़र को मैं क्या कहूँ
जो रौनक़-ए-हयात हो तस्कीन-ए-जाँ न हो

बे-इख़्तियार झुकने लगी क्यों जबीन-ए-शौक़
उस दुश्मन-ए-वफ़ा का यही आस्ताँ न हो

छेड़ा है मैं ने क़िस्सा-ए-मूसा-ओ-कोह-ए-तूर
उस को है वहम ये भी मिरी दास्ताँ न हो

हैराँ हूँ कैसे चश्म-ए-तमन्ना ने की बयाँ
वो एक कैफ़ियत जो रहीन-ए-बयाँ न हो

मैं और उस निगाह-ए-करम पर न जान दूँ
ये वहम था कि वो भी प-ए-इम्तिहाँ न हो

ख़्वाहिश ये है कि नज़्र करूँ ये मता'-ए-दिल
फिर सोचता हूँ एक नज़र का ज़ियाँ न हो

है इक अदा-ए-हुस्न हिजाब-ए-नज़र-फरोज़
इस पर्दा-ए-बहार में कोई निहाँ न हो

महरूमियों ने रंज को राहत बना दिया
अब तल्ख़ी-ए-हयात भी शायद गिराँ न हो