उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dil mein wo kaifiyat-e-nashsha-e-sahba hi nahin

दिल में वो कैफ़ियत-ए-नश्शा-ए-सहबा ही नहीं

دل میں وہ کیفیت نشۂ صہبا ہی نہیں

शायर: Habeeb Ahmad Siddiqui9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिल में वो कैफ़ियत-ए-नश्शा-ए-सहबा ही नहीं
दरपय-ए-होश निगाह-ए-तरब-अफ़ज़ा ही नहीं

लाला-ओ-गुल में कशिश है न मह-ओ-अंजुम में
अब निगाहों पे हिजाबात-ए-तमन्ना ही नहीं

इस तरह मुझ से तख़ातुब है कि जैसे मैं ने
चश्म-ए-मुश्ताक़ से उन को कभी देखा ही नहीं

क्या बने कोई हरीफ़-ए-निगह-ए-सहर-तराज़
हिम्मत-अफ़ज़ा कोई दर-पर्दा इशारा ही नहीं

दामन-ए-ग़म भी कहीं छूट न जाए हमदम
ज़िंदगी के लिए फिर कोई सहारा ही नहीं

इस क़दर ख़ूगर-ए-बेदाद किया दुनिया ने
अब मुझे शिकवा-ए-बे-मेहरी-ए-दुनिया ही नहीं

दिल है ख़ूँ रूह है बेताब नज़र है ख़ीरा
हम ये समझे थे कि पादाश-ए-तमन्ना ही नहीं

चश्म-ए-मुश्ताक़ से घबरा गई चश्म-ए-ख़ंदाँ
मेरी नज़रों को तक़ाज़े का सलीक़ा ही नहीं

क्या करें गर न जिएँ कौसर-ओ-तूबा के लिए
जिन ग़रीबों के लिए राहत-ए-दुनिया ही नहीं