उर्दू शायरी · ग़ज़ल

girah jo paD gai ranjish mein wo mushkil se niklegi

गिरह जो पड़ गई रंजिश में वो मुश्किल से निकलेगी

گرہ جو پڑ گئی رنجش میں وہ مشکل سے نکلے گی

शायर: Dagh Dehlvi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गिरह जो पड़ गई रंजिश में वो मुश्किल से निकलेगी
न उन के दिल से निकलेगी न मेरे दिल से निकलेगी

नहीं दुश्वार कुछ अपने मकाँ से ला-मकाँ जाना
वहीं पहुँचाएगी जो राह जिस मंज़िल से निकलेगी

मिरी कश्ती अगर छूटेगी दरिया-ए-मोहब्बत में
तो सबसे पहले बिस्मिल्लह लब-ए-साहिल से निकलेगी

बड़ी सख़्ती से मेरी जान निकली है कई दिन में
यकायक लाश क्यूँकर कूचा-ए-क़ातिल से निकलेगी

तरशते हैं क़यामत के ग़ज़ब के रात दिन फ़िक़रे
नई जब बात निकलेगी तिरी महफ़िल से निकलेगी

रुमूज़-ए-आशिक़ी को आशिक़ो तुम 'दाग़' से पूछो
कि बारीकी में बारीकी उसी कामिल से निकलेगी