उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ghup andhera hai kya qayamat hai

घुप अंधेरा है क्या क़यामत है

گھپ اندھیرا ہے کیا قیامت ہے

शायर: Ijtiba Rizvi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

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घुप अंधेरा है क्या क़यामत है
इक तबस्सुम की फिर ज़रूरत है

सर को सीने पे रख के सुन लीजे
आप से दिल को कुछ शिकायत है

नासेहों से है मय-कशी का फ़रोग़
शौक़ पर्वर्दा-ए-मलामत है

दिल की धड़कन जो है मदार-ए-हयात
इक ज़रा तेज़ हो तो आफ़त है

आग पानी से भाप उठती रही
हम समझते रहे मोहब्बत है

दहर में हम कमाल-ए-सनअ'त हैं
और बाक़ी फ़रेब-ए-सनअ'त है

ज़ुल्फ़ बिखरा दो दोनों आलम पर
कि अँधेरे की फिर ज़रूरत है

अभी जीने का हुक्म है 'रिज़वी'
और क्या जाने क्या मुसीबत है