उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ghazal ke peD ko barg-e-nawa nahin dete

ग़ज़ल के पेड़ को बर्ग-ए-नवा नहीं देते

غزل کے پیڑ کو برگ نوا نہیں دیتے

शायर: Yawar Azeem7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ग़ज़ल के पेड़ को बर्ग-ए-नवा नहीं देते
ये क्यों मुझे मिरे मौसम खिला नहीं देते

ये चिलचिलाती हुई चुप मुझे जला देगी
तुम एक लफ़्ज़ को साया बना नहीं देते

मैं ज़िंदगी की घुटन का 'इलाज चाहता हूँ
मुझे उदास दरीचे हवा नहीं देते

हमारी आँख का इस्टेज हो गया ख़ाली
तुम अपने ख़्वाब का मंज़र दिखा नहीं देते

कहाँ गए मिरे सामाँ में चंद ज़ख़्म भी थे
मुझे भी तुम मिरा अंदोख़्ता नहीं देते

मैं इन को रौंद के आगे निकलने वाला था
अगर ये लोग मुझे रास्ता नहीं देते

नए महाज़ पे कैसे डटे रहें 'यावर'
हमारे ज़ख़्म हमें हौसला नहीं देते