उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ghazal ka shor hai andar purana

ग़ज़ल का शोर है अन्दर पुराना

غزل کا شور ہے اندر پرانا

शायर: Zafar Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ग़ज़ल का शोर है अन्दर पुराना
बहुत गूँजेगा ये पैकर पुराना

बदन पर है वही मिट्टी का मल्बूस
नज़र में है वही मंज़र पुराना

वही है हसरत-ए-मंज़िल दिलों में
वही है राह का पत्थर पुराना

पढ़ी जाती नहीं ख़्वाहिश की तहरीर
हुआ एहसास का दफ़्तर पुराना

लुटा रख़्त-ए-सफ़र दश्त-ए-हवस में
बग़ल में रह गया बिस्तर पुराना

कभी उम्मीद से आज़ाद होंगे
कभी बदलेंगे ये मेहवर पुराना

'ज़फ़र' दिल से निकल तो जाएँगे हम
बहुत याद आएगा ये घर पुराना