उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gharib chhaon pe jab shams-e-dahr Tut paDa

ग़रीब छाओं पे जब शम्स-ए-दहर टूट पड़ा

غریب چھاؤں پہ جب شمس دہر ٹوٹ پڑا

शायर: Tahir Saood Kiratpuri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ग़रीब छाओं पे जब शम्स-ए-दहर टूट पड़ा
तो आसमान से दुनिया पे क़हर टूट पड़ा

इलाही ख़ैर कि अब तू ही आबरू रखना
फ़सील-ए-नहर पे सैलाब-ए-बहर टूट पड़ा

हमारे जिस्म के क़िल’ए की शाम जैसे ही आई
हज़ारों टीसों के ख़ंजर का ज़हर टूट पड़ा

ग़रीब शख़्स की मय्यत में चार शख़्स न थे
अमीर-ए-शहर की दा'वत पे शहर टूट पड़ा

किसी की सुरमई आँखों को देख कर गुम-सुम
किसी की रूह पे कोहसार-ए-जह्र टूट पड़ा

ज़रा सी फ़न की कमी देखते ही क्या कहिए
जो मुझ में चुप था वो ग़ाज़ी-ए-बहर टूट पड़ा