उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gar mere but-e-hosh-ruba ko nahin dekha

गर मेरे बुत-ए-होश-रुबा को नहीं देखा

گر میرے بت ہوش ربا کو نہیں دیکھا

शायर: Dagh Dehlvi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गर मेरे बुत-ए-होश-रुबा को नहीं देखा
उस देखने वाले ने ख़ुदा को नहीं देखा

रहबर से ग़रज़ क्या है जो मंज़िल नज़र आए
का'बे में कहे क़िबला-नुमा को नहीं देखा

जिस शक्ल से हँसते हैं मिरे हाल पे अहबाब
रोते हुए यूँ अहल-ए-अज़ा को नहीं देखा

इतना तो बता दे मुझे ऐ नासेह-ए-मुश्फ़िक़
देखा है कि उस माह-लक़ा को नहीं देखा

जब 'दाग़' को ढूँढा किसी बुत-ख़ाने में पाया
घर में कभी उस मर्द-ए-ख़ुदा को नहीं देखा