उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gham-e-duniya ko apni zist ka hasil samajhte hain

ग़म-ए-दुनिया को अपनी ज़ीस्त का हासिल समझते हैं

غم دنیا کو اپنی زیست کا حاصل سمجھتے ہیں

शायर: Jaleel Qidwai10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ग़म-ए-दुनिया को अपनी ज़ीस्त का हासिल समझते हैं
ये वो 'उक़्दा है जिस को सिर्फ़ अहल-ए-दिल समझते हैं

हमारे दिल को तुम जिस दिन से अपना दिल समझते हो
उसी दिन से हम अपने दिल को अपना दिल समझते हैं

वफ़ा-ए-यार का अहल-ए-वफ़ा में नाम क्या होगा
जफ़ा को जब वफ़ा-ए-यार अहल-ए-दिल समझते हैं

तलाश-ए-हुस्न में जो दिल किसी मंज़िल पे रुक जाए
उसे अहल-ए-नज़र आवारा-ए-मंज़िल समझते हैं

डराया इस क़दर तूफ़ान-ए-बहर-ए-ज़िंदगानी ने
कि हम साहिल को भी मौज-ए-लब-ए-साहिल समझते हैं

नहीं हम रहरवान-ए-राह-ए-ग़ुर्बत की कोई मंज़िल
बिठा दे जिस जगह बेचारगी मंज़िल समझते हैं

नहीं हम अहल-ए-दिल के पास कुछ दिल के सिवा लेकिन
ये वो शय है जिसे कौनैन का हासिल समझते हैं

डराती क्या है दुनिया हम को मर्ग-ए-ना-गहानी से
इसे तो हम हुदूद-ए-ज़ीस्त में दाख़िल समझते हैं

हैं मसरूफ़-ए-'अमल ता-हद्द-ए-इम्काँ राह-ए-ख़िदमत में
ख़याल-ए-हश्र को अंदेशा-ए-बातिल समझते हैं

'जलील' अहवाल-ए-‘आलम पर उन्हें रोना नहीं आता
कि जो नैरंगी-ए-दुनिया-ए-आब-ओ-गिल समझते हैं