उर्दू शायरी · ग़ज़ल

firaq-o-wasl to yak-dam thin aarzi rasmen

फ़िराक़-ओ-वस्ल तो यक-दम थीं 'आरज़ी रस्में

فراق و وصل تو یک دم تھیں عارضی رسمیں (ردیف .. ے)

शायर: Idris Babar9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

फ़िराक़-ओ-वस्ल तो यक-दम थीं 'आरज़ी रस्में
हमें गुनाह ने बाँधा हुआ है आपस में

ख़ुशी थी इतनी तिरी रेल छूट जाने की
मैं बुक्स रख के उठाता रहा तिरी क़स्में

मिरी तो ख़ैर थी कम्बख़्त तितलियों को भी
मज़ा ही और मिला सुर्ख़ फूलों के रस में

नज़र जो ख़्वाब सा चेहरा कोई सिरहाने पड़ा
उसे भी चाट गया मैं किताब की चस में

वो बाग़ लाज़मी होगा ये पेड़ भी होगा
पर ऐसे फूल तो खिलते नहीं हैं उंदुलस में

सहर की पहली किरन ने क़फ़स में पर मारे
तो ख़ून दौड़ गया पत्थरों की नस-नस में

उसी के पीछे है दुनिया का सब से दौलत-मंद
जो हुस्न इक दफ़ा देखा था गश्ती सर्कस में

वो पैसे गिनती है तनती है चलती बनती है
मैं सोचता हूँ कि क्या कुछ नहीं मिरे बस में

अभी sakuul की घंटी नहीं बजी 'बाबर'
मैं झुक के बाँध रहा हूँ मतीन के तस्मे