उर्दू शायरी · ग़ज़ल

fikr rakhte hain kahan zehn agar rakhte hain

फ़िक्र रखते हैं कहाँ ज़ेहन अगर रखते हैं

فکر رکھتے ہیں کہاں ذہن اگر رکھتے ہیں

शायर: Aabid Jafri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

फ़िक्र रखते हैं कहाँ ज़ेहन अगर रखते हैं
दश्त-ए-बे-आब में जो तुख़्म-ए-हुनर रखते हैं

हर नई बात भुला देती है पहले का ख़याल
वो तो अख़बार हैं बस ताज़ा ख़बर रखते हैं

मिट गया रंग-ए-तअल्लुक़ तो ये चेहरे के नुक़ूश
एक इक ख़त्त-ए-तअस्सुर में ख़बर रखते हैं

ऐसे लोगों का मिला हम को ज़माना जो लोग
कोर-बीना हैं मगर हम पे नज़र रखते हैं

कोई आहट है न दस्तक कि बिछड़ जाए सुकूत
जिन को दीवार मयस्सर हो वो दर रखते हैं

जब भी आती है किसी सम्त से मक़्तल की हवा
ध्यान आता है अभी दोष पे सर रखते हैं