उर्दू शायरी · ग़ज़ल

fikr kar ta’mir-e-dil ki wo yahin aa jaega

फ़िक्र कर ता’मीर-ए-दिल की वो यहीं आ जाएगा

فکر کر تعمیر دل کی وہ یہیں آ جائے گا

शायर: Zafar Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

फ़िक्र कर ता’मीर-ए-दिल की वो यहीं आ जाएगा
बन गया जिस दिन मकाँ ख़ुद ही मकीं आ जाएगा

ख़ुद भी वो चालाक है लेकिन अगर हिम्मत करो
पहला पहला झूठ है उस को यक़ीं आ जाएगा

कौन सा हम रोज़ रोज़ उस को बुलाते हैं यहाँ
बे-मुरव्वत है मगर इतना नहीं आ जाएगा

हम से मिल लेने का मतलब ये नहीं होगा कि अब
हर कोई उस को बुला ले हर कहीं आ जाएगा

ज़ख़्म-ए-दिल तो सात पर्दों में छुपा होगा कहीं
और सब के सामने दाग़-ए-जबीं आ जाएगा

हम तो समझे थे कि इस लश्कर-कशी से हुस्न का
कुछ 'इलाक़ा और भी ज़ेर-ए-नगीं आ जाएगा

अब तो जैसे ख़ुद भी आना चाहता है वो 'ज़फ़र'
घर गली होटल जहाँ चाहो वहीं आ जाएगा