उर्दू शायरी · ग़ज़ल

fikr-e-jahan se khele zor-e-butan se khele

फ़िक्र-ए-जहाँ से खेले ज़ोर-ए-बुताँ से खेले

فکر جہاں سے کھیلے زور بتاں سے کھیلے

शायर: JaiKrishn Chaudhry Habeeb7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

फ़िक्र-ए-जहाँ से खेले ज़ोर-ए-बुताँ से खेले
हम दौर-ए-ज़िंदगी में हर इम्तिहाँ से खेले

फूलों से कोई खेला कलियों से कोई उलझा
हम दर्द-आश्ना थे दर्द-ए-निहाँ से खेले

जब बिछड़े दोस्तों की याद आई बैठे बैठे
हम बे-क़रार हो कर अश्क-ए-रवाँ से खेले

आसाँ न था गुज़रना कुछ राह-ए-आशिक़ी से
हस्ती मिटाई अपनी अपनी ही जाँ से खेले

दुनियाँ की फ़िक्र कैसी उक़्बा का ख़ौफ़ कैसा
साक़ी की इक नज़र पर हम दो-जहाँ से खेले

गो हुस्न-ए-दिलरुबा है दिल की ख़लिश बला है
खेले सँभल के वो जो इश्क़-ए-बुताँ से खेले

माज़ी ने दी सदाएँ देखा मगर न मुड़ कर
हम यूँ 'हबीब' अक्सर उम्र-ए-रवाँ से खेले