उर्दू शायरी · ग़ज़ल

fikr-e-anjam na aaghaz ka kuchh hosh raha

फ़िक्र-ए-अंजाम न आग़ाज़ का कुछ होश रहा

فکر انجام نہ آغاز کا کچھ ہوش رہا

शायर: Yagana Changezi15 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

फ़िक्र-ए-अंजाम न आग़ाज़ का कुछ होश रहा
चार दिन तक तो जवानी का अजब जोश रहा

मैं क़फ़स में भी किसी रोज़ न ख़ामोश रहा
कश्मकश में भी तबीअ'त का वही जोश रहा

नश्शा-ए-उलफ़्त-ए-साक़ी का अजब जोश रहा
हौल-ए-सहरा-ए-क़यामत भी फ़रामोश रहा

ग़ैर हों जुरअ'-ए-कश-ए-बज़्म-ए-तमन्ना अफ़्सोस
ख़ून के घूँट मैं पीता रहा ख़ामोश रहा

हेच आफ़त न-रसद गोशा-ए-तन्हाई रा
दश्त-ए-ग़ुर्बत में मैं ये सोंंच के रू-पोश रहा

मौसम-ए-गुल की हवा दारू-ए-बेहोशी थी
सर उठाने का भी सब्ज़े को न कुछ होश रहा

निकहत-ए-गुल की तरह जामे से बाहर हूँगा
फ़स्ल-ए-गुल का जो गुलिस्ताँ में यही जोश रहा

बहर-ए-रहमत में बहुत होगा तलातुम बरपा
तुझ को ऐ अश्क-ए-नदामत जो यही जोश रहा

अपने सर से भी किसी रोज़ गुज़र जाएगा
आब-ए-शमशीर को क़ातिल जो यही जोश रहा

साया-ए-दामन-ए-क़ातिल में जो नींद आई मुझे
फिर तो करवट भी बदलने का न कुछ होश रहा

धूम सुनता रहा अब आते हैं अब आते हैं
हश्र तक मैं यूँही खोले हुए आग़ोश रहा

दूर खिंचती ही गई मंज़िल-ए-मक़्सूद मगर
रह-रव-ए-इश्क़ की हिम्मत का वही जोश रहा

रहमत-ए-हक़ रही हम आसियों पर साया-फ़गन
सर पे छाया हुआ इक अब्र-ए-ख़ता-पोश रहा

उठते उठते थी वही बज़्म की मस्ताना रविश
चलते चलते भी ख़ुम-ए-मय को वही जोश रहा

फिर गईं आँखें मिरी कूचा-ए-जानाँ की तरफ़
शुक्र है मरते दम इतना तो मुझे होश रहा