उर्दू शायरी · ग़ज़ल

fasil-e-shahr se niklo bhala isi mein hai

फ़सील-ए-शहर से निकलो भला इसी में है

فصیل شہر سے نکلو بھلا اسی میں ہے

शायर: Qais Rampuri5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

फ़सील-ए-शहर से निकलो भला इसी में है
कि ज़लज़लों की हुकूमत गली गली में है

दिया कहीं भी जलाना मुझे ख़बर करना
मिरे लहू का उजाला भी रौशनी में है

वो मुस्कुरा के ख़ुदा का पता बताता है
न जाने कौन सा जादू उस आदमी में है

चला हूँ मौत के पैकर को क़त्ल करने मगर
ये वस्फ़-ए-ख़ास तो ख़ुद मेरी ज़िंदगी में है

दरीचे अपने खुले रखना शब के पिछले पहर
सुना है 'इश्क़ का अंदाज़ चाँदनी में है