उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek hi manzar to behtar tha hamein

एक ही मंज़र तो बेहतर था हमें

ایک ہی منظر تو بہتر تھا ہمیں

शायर: Aarif Nazeer7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

एक ही मंज़र तो बेहतर था हमें
यूँ पस-ए-मंज़र का कब डर था हमें

फ़ाइलों से कह दिया था हाल-ए-दिल
यार बेहतर घर से दफ़्तर था हमें

जाम में होता ख़ुलूस-ए-दिल अगर
एक क़तरा भी समुंदर था हमें

दिल जो पत्थर था वो पत्थर ही रहा
क्यों कोई दरपेश आज़र था हमें

अब हमें अपनी ख़बर रहती नहीं
मसअला मा'लूम घर घर था हमें

ये रक़ीब-ए-जाँ कभी था नामा-बर
इस से बेहतर तो कबूतर था हमें

किस क़दर रोते थे 'आरिफ़' फूट कर
एक कांधा जब मयस्सर था हमें