उर्दू शायरी · ग़ज़ल

do din ki hansi do din ki KHushi anjam-e-amal rona hi paDa

दो दिन की हँसी दो दिन की ख़ुशी अंजाम-ए-अमल रोना ही पड़ा

دو دن کی ہنسی دو دن کی خوشی انجام‌ عمل رونا ہی پڑا

शायर: Ijtiba Rizvi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दो दिन की हँसी दो दिन की ख़ुशी अंजाम-ए-अमल रोना ही पड़ा
इक उम्र गँवाई जिस के लिए इक रोज़ उसे खोना ही पड़ा

हम और अलाएक़ से छूटें मुमकिन नहीं जब तक हम हम हैं
दरिया को ब-ईं आज़ाद-रवी ज़ंजीर-ब-पा होना ही पड़ा

बाज़ार में आ कर नादाँ दिल मंज़र के खिलौनों पर मचला
और पीर-ए-ख़िरद को काँधे पर अम्बार-ए-नज़र ढोना ही पड़ा

क्या जानिए आख़िर क्यों इतनी आज़ुर्दा रही होंटों से हँसी
क़िस्मत पे भी हँसना जब चाहा आई न हँसी रोना ही पड़ा

हम तुख़्म-ए-मोहब्बत जन्नत से सीने में चुरा कर ले आए
इस रेत में क्या उगता वो भला हाँ लाए थे बोना ही पड़ा

बेदार-दिली के मंसूबे हम क्या क्या बाँध के आए थे
दुनिया ने थपक कर लोरी दी नींद आ ही गई सोना ही पड़ा