उर्दू शायरी · ग़ज़ल

din ke sine pe sham ka patthar

दिन के सीने पे शाम का पत्थर

دن کے سینے پہ شام کا پتھر

शायर: Aadil Raza Mansoori8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिन के सीने पे शाम का पत्थर
एक पत्थर पे दूसरा पत्थर

ये सुना था कि देवता है वो
मेरे हक़ ही में क्यूँ हुआ पत्थर

दाएरे बनते और मिटते थे
झील में जब कभी गिरा पत्थर

अब तो आबाद है वहाँ बस्ती
अब कहाँ तेरे नाम का पत्थर

हो गए मंज़िलों के सब राही
दे रहा है किसे सदा पत्थर

सारे तारे ज़मीं पे गिर जाते
ज़ोर से मैं जो फेंकता पत्थर

नाम ने काम कर दिखाया है
सब ने देखा है तैरता पत्थर

तू उसे क्या उठाएगा 'आदिल'
'मीर' तक से न उठ सका पत्थर