उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dil ka ye dasht arsa-e-mahshar laga mujhe

दिल का ये दश्त 'अर्सा-ए-महशर लगा मुझे

دل کا یہ دشت عرصۂ محشر لگا مجھے

शायर: Zafar Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिल का ये दश्त 'अर्सा-ए-महशर लगा मुझे
मैं क्या बला हूँ रात बड़ा डर लगा मुझे

आगे भी 'इश्क़ में हुईं रुस्वाइयाँ मगर
अब के वफ़ा का ज़ख़्म जबीं पर लगा मुझे

ऐ दिल वो मेहरबाँ है यूँही बद-गुमाँ न हो
मारा था उस ने ग़ैर को पत्थर लगा मुझे

हर सू तिरे वुजूद की ख़ुशबू थी ख़ेमा-ज़न
वो दिन कि अपना घर भी तिरा घर लगा मुझे

हँस कर न टाल जा कि ये उम्मीद की किरन
वो तीर है कि सीने के अंदर लगा मुझे

तारीकी-ए-हयात का अंदाज़ा कर कि आज
दाग़-ए-शिकस्त मेहर-ए-मुनव्वर लगा मुझे

साँचे तो थे ग़ज़ल के सिवा भी मगर 'ज़फ़र'
क्या जाने क्यूँ ये ज़र्फ़ हसीं-तर लगा मुझे