उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dil-e-betab mera wo na phansane pae

दिल-ए-बेताब मिरा वो न फँसाने पाए

دل بے تاب مرا وہ نہ پھنسانے پائے

शायर: Dagh Dehlvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिल-ए-बेताब मिरा वो न फँसाने पाए
दो ही झटके जो ज़रा ज़ुल्फ़-ए-दोता ने पाए

हाथ-पाई हुई मयख़ाने में ज़ाहिद से कहीं
हम ने तस्बीह के बिखरे हुए दाने पाए

छेड़ मंज़ूर न हो तुझ को तो मिज़्गाँ तेरी
दिल-ए-बेताब को उंगली न लगाने पाए

जल गया क्या मिरी आतिश-क़दमी से जंगल
चार तिनके न कहीं बाद-ए-सबा ने पाए

हम ने अपना दिल-ए-गुम-गश्ता न पाया खो कर
वर्ना याँ ढूँढने वालों ने ख़ज़ाने पाए

ला शब-ए-वा'दा उसे खींच के ऐ जज़्बा-ए-दिल
हीला-जू पाँव में मेंहदी न लगाने पाए

हूर के वास्ते ज़ाहिद ने इबादत की है
सैर तो जब है कि जन्नत में न जाने पाए