उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dil-e-be-tab ko kab wasl ka yara hota

दिल-ए-बे-ताब को कब वस्ल का यारा होता

دل بے تاب کو کب وصل کا یارا ہوتا

शायर: Yagana Changezi14 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिल-ए-बे-ताब को कब वस्ल का यारा होता
शादी-ए-दौलत-ए-दीदार ने मारा होता

शब-ए-ग़म ज़हर ही खाने का मज़ा था वर्ना
इंतिज़ार-ए-सहर-ए-वस्ल ने मारा होता

शब-ए-हिज्राँ की बला टाले नहीं टलती है
भोर कर देते अगर ज़ोर हमारा होता

आई जिस शान से मदफ़न में सवारी मेरी
देखते ग़ैर तो मरना ही गवारा होता

क्यूँ न सीने से लगी रहती अमानत तेरी
दाग़-ए-दिल क्यूँ न हमें जान से प्यारा होता

सर झुकाए तिरी उम्मीद पे बैठे हैं हम
क़ातिल इस बार अमानत को उतारा होता

एक हो जाती अभी काफ़िर-ओ-दीं-दार की राह
अगर उन जुट्टी भुवों का इक इशारा होता

भीगती जाती है रात और अभी सोहबत है गर्म
जाम लब-रेज़ इसी आलम में हमारा होता

निगह-ए-लुत्फ़ से महरूम हूँ अब तक साक़ी
सफ़-ए-आख़िर की तरफ़ भी इक इशारा होता

दूर से साग़र-ओ-मीना को खड़ा तकता हूँ
दिल कोई रखता तो मुझ को भी पुकारा होता

दूर इतनी न कभी खिंचती अदम की मंज़िल
काश कुछ नक़्श-ए-क़दम ही का सहारा होता

यास अब आप कहाँ और कहाँ बाँग-ए-जरस
कौन इस वादी-ए-ग़ुर्बत में तुम्हारा होता

देखते रह गए 'यास' आप ने अच्छा न किया
डूबते वक़्त किसी को तो पुकारा होता

सूरत-ए-ज़ाहिरी इक पर्दा-ए-तारीक थी 'यास'
हुस्न-ए-मा'नी का कन-आँखियों से नज़ारा होता