उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dil bujh gaya to garmi-e-bazar bhi nahin

दिल बुझ गया तो गर्मी-ए-बाज़ार भी नहीं

دل بجھ گیا تو گرمئ بازار بھی نہیں

शायर: Ejaz Warsi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिल बुझ गया तो गर्मी-ए-बाज़ार भी नहीं
अब ज़िक्र-ए-बादा-ओ-लब-ओ-रुख़सार भी नहीं

अपना था ख़ल्वतों में कभी परतव-ए-जमाल
क़िस्मत में अब तो साया-ए-दीवार भी नहीं

शिकवा ज़बाँ पे फूल से अहबाब का ग़लत
ऐ दोस्त मुझ को तो गिला-ए-ख़ार भी नहीं

आया न रास आप को ऐ शैख़ रोज़-ए-हश्र
और लुत्फ़ ये है आप गुनहगार भी नहीं

क़ाएम हूँ अपनी तौबा पे मैं आज भी मगर
कोई हसीं पिलाए तो इंकार भी नहीं

क्या कीजिए नुमाइश-ए-ग़म ख़ून-ए-दिल के बा'द
अब आरज़ू-ए-दीदा-ए-ख़ूँबार भी नहीं

ऐलान-ए-बे-ख़ुदी है हर इक क़तरा-ए-लहू
मेरे जुनूँ की हद रसन-ओ-दार भी नहीं

नूर-ए-सहर के नाम पे भटकें न क़ाफ़िले
दर-अस्ल अभी तो सुब्ह के आसार भी नहीं

वा'इज़ ख़याल-ए-तौबा बजा है मगर अभी
मैं तो ब-क़द्र-ए-ज़र्फ़ गुनहगार भी नहीं