उर्दू शायरी · ग़ज़ल

diwaron se mil kar rona achchha lagta hai

दीवारों से मिल कर रोना अच्छा लगता है

دیواروں سے مل کر رونا اچھا لگتا ہے

शायर: Qaisarul Jafri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दीवारों से मिल कर रोना अच्छा लगता है
हम भी पागल हो जाएँगे ऐसा लगता है

कितने दिनों के प्यासे होंगे यारो सोचो तो
शबनम का क़तरा भी जिन को दरिया लगता है

आँखों को भी ले डूबा ये दिल का पागल-पन
आते जाते जो मिलता है तुम सा लगता है

इस बस्ती में कौन हमारे आँसू पोंछेगा
जो मिलता है उस का दामन भीगा लगता है

दुनिया भर की यादें हम से मिलने आती हैं
शाम ढले इस सूने घर में मेला लगता है

किस को पत्थर मारूँ 'क़ैसर' कौन पराया है
शीश-महल में इक इक चेहरा अपना लगता है