उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dekho to kuchh ziyan nahin khone ke bawajud

देखो तो कुछ ज़ियाँ नहीं खोने के बावजूद

دیکھو تو کچھ زیاں نہیں کھونے کے باوجود

शायर: Zafar Iqbal8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

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देखो तो कुछ ज़ियाँ नहीं खोने के बावजूद
होता है अब भी 'इश्क़ न होने के बावजूद

शायद ये ख़ाक में ही समाने की मश्क़ हो
सोता हूँ फ़र्श पर जो बिछौने के बावजूद

करता हूँ नींद में ही सफ़र सारे शह्र का
फ़ारिग़ तो बैठता नहीं सोने के बावजूद

होती नहीं है मेरी तसल्ली किसी तरह
रोने का इंतिज़ार है रोने के बावजूद

पानी तो एक 'उम्र से मुझ पर है बे-असर
मैला हुआ हूँ और भी धोने के बावजूद

थी प्यास तो वहीं की वहीं और मैं वहाँ
ख़ुश था ज़रा सा होंठ भिगोने के बावजूद

ये कीमिया-गरी मिरी अपनी है इस लिए
मैं राख ही समझता हूँ सोने के बावजूद

डरता हूँ फिर कहीं से निकाले न सर 'ज़फ़र'
मैं उस को अपने साथ डुबोने के बावजूद