उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dayar-e-gham se hum bahar nikal ke sher kahte hain

दयार-ए-ग़म से हम बाहर निकल के शेर कहते हैं

دیار غم سے ہم باہر نکل کے شعر کہتے ہیں (ردیف .. ے)

शायर: Balmohan panday6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दयार-ए-ग़म से हम बाहर निकल के शेर कहते हैं
मसाइल हैं बहुत से उन में ढल के शेर कहते हैं

दहकते आग के शो'लों पे चल के शेर कहते हैं
हमें पहचान लीजे हम ग़ज़ल के शेर कहते हैं

रिवायत के पुजारी इस लिए नाराज़ हैं हम से
ख़ता ये है नए रस्तों पे चल के शेर कहते हैं

हमें तन्हाइयों का शोर जब बेचैन करता है
इकट्ठी करते हैं यादें ग़ज़ल के शेर कहते हैं

सितारों की तरह रौशन हैं जिन के लफ़्ज़ ज़ेहनों में
वो शायद मोम की सूरत पिघल के शेर कहते हैं

हमारी शाइ'री उस को कहीं रुस्वा न कर डाले
सो उस के शहर में थोड़ा सँभल के शेर कहते