उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dar dariche ke bina aur kisi chhat ke baghair

दर दरीचे के बिना और किसी छत के बग़ैर

در دریچے کے بنا اور کسی چھت کے بغیر

शायर: Aamir Azher7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दर दरीचे के बिना और किसी छत के बग़ैर
हम तिरे शहर में साकिन हैं सुकूनत के बग़ैर

जंग ऐसी है अबद तक भी रहेगी जारी
मसअला हल नहीं होना है क़यामत के बग़ैर

ख़ामुशी जिस्म पे चढ़ती है हरारत की तरह
रोज़ इक शोर उतरता है 'अलामत के बग़ैर

साथ में यार भी हो और फिर इतवार भी हो
बात बनती नहीं सिगरेट की रि'आयत के बग़ैर

यार कैसे न हो मेरा कि मिरा यार मुझे
हर तरह से है क़ुबूल और वज़ाहत के बग़ैर

ध्यान रखना कि ये लहजा है हमारा लहजा
पुर-असर हो नहीं सकता है मोहब्बत के बग़ैर

काम ऐसा है कि करना ही पड़ेगा 'आमिर'
चाहे तेशे के बिना हो या रियाज़त के बग़ैर