उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chashm-e-nam ho to umanD aate hain dariya munh par

चश्म-ए-नम हो तो उमँड आते हैं दरिया मुँह पर

چشم نم ہو تو امنڈ آتے ہیں دریا منہ پر

शायर: Pandit Daya Shankar Naseem Lakhnawi11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चश्म-ए-नम हो तो उमँड आते हैं दरिया मुँह पर
खींचिए आह तो आता है कलेजा मुँह पर

ख़ाल-ए-रुख़्सार को तेरे नहीं देखा जैसे
सौ क़सम लीजे जो इक दाना हो रक्खा मुँह पर

रू-ए-गुल-रंग पे आख़िर ख़त-ए-सब्ज़ आ ही गया
है मसल जिस से डरे फिर वही आया मुँह पर

ख़्वाब गूँगे का हुआ यार का शिकवा गोया
दिल में फिरता है मगर ला नहीं सकता मुँह पर

कल जो तुम बोसे पे बिगड़े थे कि किस वक़्त कहाँ
ले के मुँह अपना सा रह जाते जो कहता मुँह पर

हम से यूँ कड़वी रक़ीबों से ये मीठी बातें
झूट क्या ज़हर है सच बात का कहना मुँह पर

जी जलाते हैं हसीं कौन मुँह ऐसों के लगे
कोई देता नहीं अंगारे के बोसा मुँह पर

एवज़-ए-बोसा मज़ा था जो वो गाली देता
लाल-ए-लब मुँह मिरे लगता तो मैं चढ़ता मुँह पर

पाक-बाज़ों से हिजाब आप को बे-वज्ह नहीं
दिल में हो शर्म तो है आँख का पर्दा मुँह पर

सूरत-ए-नै कभी ग़ीबत में न दम मारेंगे
साफ़ जो होएगा दिल का वो कहेगा मुँह पर

नामा-बर को तो सुनानी थी सफ़ा ग़ीबत में
ख़त के आने का सुनाया हमें फ़िक़रा मुँह पर